ॐ नमः शिवाय। जय श्री कृष्णा साथियों।
आज हम श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय 'अर्जुनविषादयोग' का श्रवण प्रारंभ कर रहे हैं। गीता का यह प्रथम अध्याय उस मानसिक कुरुक्षेत्र का द्वार है, जहाँ से ज्ञान की सरिता प्रवाहित होती है। इस अध्याय में कुल 47 श्लोक हैं, जो हमें कुरुक्षेत्र की उस ऐतिहासिक और धर्ममयी भूमि पर ले जाते हैं, जहाँ न्याय और अन्याय के बीच महासंग्राम छिड़ने वाला है।
| श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) | Bhagavad Gita Adhyay 1 | Bhagwat Geeta Shlok With Meaning In Hindi |
कल्पना कीजिए उस दृश्य की, जहाँ एक ओर धर्मराज युधिष्ठिर की न्यायप्रियता
खड़ी है और दूसरी ओर दुर्योधन का दम्भ और अहंकार। अठारह अक्षौहिणी सेनाएं
आमने-सामने खड़ी हैं, शस्त्रों की खनक और घोड़ों की हिनहिनाहट से
वातावरण गूँज रहा है। यह केवल एक युद्धभूमि नहीं है, बल्कि यह मानव मन के भीतर
चलने वाले द्वंद्व का प्रतिबिंब है। इस अध्याय का नाम 'विषाद योग' रखा गया है, जो अपने आप में एक गहरा
रहस्य है। विषाद का अर्थ है—घोर दुख या अवसाद। सामान्यतः दुख मनुष्य को अंधकार की
ओर ले जाता है,
यहीं हम देखेंगे कि कैसे एक महायोध्दा, जिसने जीवन भर शस्त्रों का अभ्यास किया, युद्ध की अंतिम घड़ी में अपनी भावनाओं के आगे विवश हो जाता है। मोह का पर्दा जब बुद्धि पर पड़ता है, तो कर्तव्य धूमिल होने लगता है। इस अध्याय का प्रारंभ राजा धृतराष्ट्र के एक स्वार्थपूर्ण प्रश्न से होता है और अंत अर्जुन के अश्रुपूरित नेत्रों और गाण्डीव के त्याग से। आइए, हम भी कुरुक्षेत्र की उस पवित्र मिट्टी का अनुभव करें और देखें कि कैसे अधर्म का पक्ष भयभीत है और धर्म का पक्ष शांत और दृढ़।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग) श्लोक, अर्थ और भावार्थ
श्लोक 1:
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
धृतराष्ट्र बोले—हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
[भावार्थ]
साथियों, गीता का प्रथम शब्द है 'धर्मक्षेत्रे'। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, परंतु उनका यह प्रश्न उनकी गहरी मानसिक अंधता और पक्षपात को उजागर करता है। उन्होंने 'मामकाः' (मेरे पुत्र) और 'पाण्डवाः' (पांडु के पुत्र) कहकर अपने ही परिवार को दो हिस्सों में बाँट दिया। यह 'मेरे-तेरे' का भेद ही संसार के समस्त क्लेशों और अधर्म का मूल कारण है। धृतराष्ट्र को भय था कि पुण्यभूमि कुरुक्षेत्र के प्रभाव से कहीं उनके पुत्रों का अधर्मी विचार बदल न जाए।
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श्लोक 2:
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥
संजय बोले—उस समय राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की व्यूह रचना युक्त सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
[भावार्थ]
संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि पाण्डवों की सेना कौरवों की तुलना में छोटी होने के बाद भी उनकी सुव्यवस्थित 'व्यूह रचना' को देखकर दुर्योधन भीतर से विचलित हो गया। अपनी असुरक्षा को छिपाने के लिए वह सीधे अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है। यहाँ 'राजा' शब्द दुर्योधन के पद के अहंकार और उसकी छिपी हुई घबराहट को एक साथ प्रकट करता है।
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श्लोक 3:
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥
हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की गई पाण्डुपुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए।
[भावार्थ]
दुर्योधन यहाँ कूटनीति का आश्रय ले रहा है। वह द्रोणाचार्य को याद दिलाता है कि सामने खड़ी सेना का सेनापति धृष्टद्युम्न है, जो द्रोणाचार्य का ही शिष्य था और द्रोणाचार्य के वध के लिए ही जन्मा था। दुर्योधन गुरु के मन में प्रतिशोध की अग्नि सुलगाना चाहता है ताकि वे पाण्डवों के प्रति कोमलता न रखें।
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श्लोक 4:
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
इस पाण्डव सेना में भीम और अर्जुन के समान युद्ध करने वाले अनेक शूरवीर और महारथी हैं, जैसे—सात्यकि, राजा विराट और द्रुपद।
[भावार्थ]
दुर्योधन पाण्डव पक्ष के योद्धाओं की वीरता का वर्णन करते हुए उनकी शक्ति का आकलन कर रहा है। जब मनुष्य भीतर से भयभीत होता है, तो वह विपक्षी की शक्ति को बहुत ध्यान से देखता है।
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श्लोक 5:
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥
साथ ही धृष्टकेतु, चेकितान, बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य भी यहाँ उपस्थित हैं।
[भावार्थ]
दुर्योधन एक-एक योद्धा का नाम लेकर द्रोणाचार्य को सचेत कर रहा है। वह समझ पा रहा है कि पाण्डवों ने केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि श्रेष्ठ चरित्र वाले मित्रों का एक अभेद्य संगठन खड़ा किया है।
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श्लोक 6:
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र—ये सभी महारथी इस युद्ध में सम्मिलित हैं।
[भावार्थ]
पाण्डव सेना की अगली पीढ़ी का वर्णन करते हुए दुर्योधन की दृष्टि अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्रों पर जाती है। उसे आभास है कि धर्म रक्षा हेतु पाण्डवों का पूरा वंश आज यहाँ अडिग खड़ा है।
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श्लोक 7:
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारे पक्ष में भी जो विशिष्ट योद्धा हैं, आप उन्हें जान लीजिए। मैं आपकी जानकारी के लिए अपनी सेना के प्रमुख नायकों के नाम बताता हूँ।
[भावार्थ]
अब दुर्योधन अपनी सेना की प्रशंसा कर स्वयं को झूठा आश्वासन देने का प्रयास कर रहा है। वह द्रोणाचार्य को 'द्विजोत्तम' कहकर संबोधित करता है, जिसका अर्थ है—ब्राह्मणों में श्रेष्ठ। यह एक सूक्ष्म संकेत है कि वे युद्ध में ब्राह्मणोचित दया न दिखाएं।
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श्लोक 8:
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥
आप स्वयं, पितामह भीष्म, कर्ण, विजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा—ये हमारी सेना के स्तम्भ हैं।
[भावार्थ]
दुर्योधन अपनी सैन्य शक्ति का परिचय दे रहा है। भीष्म और द्रोण जैसे महापुरुषों का नाम कर्ण जैसे शूरवीरों के साथ लेना उसकी रणनीति का हिस्सा है। वह अपनी विजय के प्रति दृढ़ निश्चय दिखाना चाहता है।
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श्लोक 9:
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
इनके अतिरिक्त और भी अनेक शूरवीर हैं जो मेरे लिए अपना जीवन त्यागने को तैयार हैं। वे अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित और युद्ध कला में अत्यंत निपुण हैं।
[भावार्थ]
यहाँ 'मदर्थे त्यक्तजीविताः' शब्द उसकी स्वार्थी सोच को प्रकट करता है। दुर्योधन को लगता है कि ये सब वीर 'उसके स्वार्थ' के लिए प्राण देंगे। वह भूल गया है कि योद्धा धर्म के लिए लड़ते हैं, किसी व्यक्ति के अहंकार के लिए नहीं।
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श्लोक 10:
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है, जबकि भीम द्वारा रक्षित इन पाण्डवों की सेना सरलता से जीती जा सकती है।
[भावार्थ]
दुर्योधन अपनी विशाल सेना की संख्या पर गर्व कर रहा है। उसे लगता है कि भीष्म पितामह के रहते कोई उसे हरा नहीं सकता। वह केवल बाहरी शक्ति को देख रहा है और उस दिव्य शक्ति को नहीं पहचान पा रहा जो पांडवों के साथ खड़ी है।
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श्रीमद्भगवद्गीता ऑडियोबुक: अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग)
अब तक हमने देखा कि कैसे राजा धृतराष्ट्र के मन में अपने पुत्रों की विजय को लेकर संशय है। वहीं युद्धभूमि में दुर्योधन, पाण्डवों की सैन्य कुशलता को देखकर विचलित हो जाता है और अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर पाण्डव पक्ष के महारथियों की गणना करता है। दुर्योधन अपनी सेना की शक्ति और भीष्म पितामह के संरक्षण पर अत्यधिक गर्व कर रहा है, परंतु उसके शब्दों में छिपी असुरक्षा साफ़ झलक रही है। आइए अब देखते हैं कि युद्ध की घोषणा के वे निर्णायक पल कैसे घटित हुए।
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श्लोक 11:
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
इसलिए आप सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह दृढ़ता से स्थित रहते हुए, सब ओर से केवल भीष्म पितामह की ही रक्षा करें।
[भावार्थ]
दुर्योधन अपनी सेना के महारथियों को अंतिम निर्देश दे रहा है। उसे भली-भाँति ज्ञान है कि पितामह भीष्म ही उसकी सेना की शक्ति का मुख्य आधार और सबसे बड़ा सुरक्षा कवच हैं। उसे यह भय है कि कहीं पाण्डव पक्ष के महारथी मिलकर भीष्म पर प्रहार न कर दें। दुर्योधन की यह आज्ञा उसकी सैन्य रणनीति से अधिक उसकी आंतरिक असुरक्षा को प्रकट करती है। उसे लगता है कि यदि भीष्म सुरक्षित हैं, तो उसकी विजय निश्चित है।
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श्लोक 12:
तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥
कुरुवंश के वयोवृद्ध, प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करने के लिए सिंह की दहाड़ के समान गरज कर बड़े जोर से शंख बजाया।
[भावार्थ]
पितामह भीष्म एक अत्यंत अनुभवी और चतुर सेनापति थे। उन्होंने देख लिया कि दुर्योधन असमंजस और घबराहट में डूबा हुआ है। अतः उसे उत्साहित करने के लिए उन्होंने सिंह के समान गर्जना की और अपना शंख बजाया। यह 'सिंहनाद' युद्ध के आरंभ की औपचारिक घोषणा थी। यद्यपि भीष्म जानते थे कि दुर्योधन का मार्ग अधर्म का है, फिर भी अपने पद की गरिमा और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहते हुए उन्होंने यह साहसी कदम उठाया।
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श्लोक 13:
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥
उसके पश्चात शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंगे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा ही भयानक हुआ।
[भावार्थ]
जैसे ही भीष्म पितामह ने शंख फूँका, पूरी कौरव सेना में एक विद्युत-प्रवाह सा दौड़ गया। हज़ारों वाद्य यंत्र—शंख, ढोल और नगाड़े एक साथ गूँज उठे। यह कोलाहल इतना तीव्र और डरावना था कि इसने पृथ्वी और आकाश के अंतराल को हिलाकर रख दिया। यह भीषण ध्वनि कुरुक्षेत्र की शांति के अंत और एक महाविनाशकारी संहार के प्रारंभ का उद्घोष थी।
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श्लोक 14:
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥
इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने-अपने दिव्य शंख बजाए।
[भावार्थ]
साथियों, अब यहाँ एक महान अंतर को अनुभव कीजिए। जहाँ कौरवों का घोष केवल एक भयानक कोलाहल था, वहीं पाण्डवों के पक्ष से जो ध्वनि उठी, उसमें 'दिव्यता' और 'पवित्रता' थी। साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन एक अलौकिक रथ पर विराजमान थे, जिसे स्वयं अग्निदेव ने प्रदान किया था। श्वेत अश्व सत्य की विजय और मन की शुद्धि का संकेत देते हैं। यहाँ भगवान को 'माधव' कहा गया है, जो सौभाग्य के स्वामी हैं। यह श्लोक पाण्डव पक्ष के उच्च नैतिक बल और ईश्वर के सानिध्य को सिद्ध करता है।
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श्लोक 15:
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥
श्रीकृष्ण ने 'पाञ्चजन्य' नामक शंख बजाया, अर्जुन ने 'देवदत्त' नामक और भयानक कर्म करने वाले भीमसेन ने 'पौण्ड्र' नामक महाशंख बजाया।
[भावार्थ]
पाण्डव पक्ष के प्रत्येक शंख का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व और प्रभाव था। भगवान श्रीकृष्ण का शंख 'पाञ्चजन्य' अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाला था। अर्जुन का 'देवदत्त' शंख अजेय संकल्प की हुंकार था। और भीम, जिन्हें 'वृकोदर' कहा गया है, उनके शंख 'पौण्ड्र' की गर्जना शत्रुओं के हृदय को कंपाने वाली थी। इन पृथक-पृथक ध्वनियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाण्डव पूरी तरह सुसज्जित और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं।
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श्लोक 16:
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने 'अनन्तविजय' नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने 'सुघोष' और 'मणिपुष्पक' नामक शंख बजाए।
[भावार्थ]
धर्मराज युधिष्ठिर का 'अनन्तविजय' शंख धर्म की शाश्वत विजय का उद्घोष कर रहा था। नकुल और सहदेव के शंखनाद ने उस विजय-घोष को पूर्णता प्रदान की। यह श्लोक दिखाता है कि पाण्डव परिवार के पाँचों भाई एक ही लक्ष्य के लिए संगठित होकर, अपने-अपने उत्तरदायित्वों के साथ युद्धभूमि में अडिग खड़े हैं।
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श्लोक 17:
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट और अजेय सात्यकि।
[भावार्थ]
संजय यहाँ धृतराष्ट्र को उन मित्र राजाओं के नाम बता रहे हैं जो पाण्डवों के पक्ष में शंखनाद कर रहे थे। ये केवल नाम नहीं थे, बल्कि वे योद्धा थे जिन्होंने अपनी पूरी शक्ति धर्म की रक्षा के लिए समर्पित कर दी थी। भीष्म के वध के निमित्त बने शिखण्डी और पाण्डव सेना के सेनापति धृष्टद्युम्न का उल्लेख यहाँ कौरव पक्ष के लिए एक गंभीर चेतावनी था।
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श्लोक 18:
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक्॥
हे राजन् धृतराष्ट्र! राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजाओं वाले सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु—इन सभी ने सब ओर से अलग-अलग अपने शंख बजाए।
[भावार्थ]
हे पृथ्वीपति! यह पाण्डव सेना का प्रचंड सामूहिक उद्घोष था। पाण्डवों की अगली पीढ़ी, जिसमें वीर अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र सम्मिलित थे, ने भी निर्भय होकर शंखनाद किया। यह दिखाता है कि धर्म का यह संघर्ष केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि आने वाले भविष्य को सुरक्षित करने के लिए भी था। इन सबकी सम्मिलित ध्वनि ने एक अभूतपूर्व वातावरण निर्मित कर दिया।
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श्लोक 19:
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥
उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) के हृदयों को विदीर्ण कर दिया।
[भावार्थ]
यह श्लोक एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य प्रकट करता है। कौरवों ने भी शंख बजाए थे, पर उनका घोष पाण्डवों के मनोबल को तनिक भी न डिगा सका। परंतु जब पाण्डवों ने शंख फूँके, तो कौरव सेना के हृदय काँप उठे। ऐसा इसलिए, क्योंकि अधर्म के पक्ष में खड़ा व्यक्ति भीतर से सदैव संशयी और डरा हुआ होता है। सत्य की दिव्य गूँज ने कौरवों के आत्मविश्वास को युद्ध के औपचारिक आरंभ से पहले ही खंडित कर दिया।
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श्लोक 20:
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते॥
हे राजन्! इसके उपरान्त शस्त्र चलने की तैयारी के समय, उन मोर्चा बांधे हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों को देखकर, कपिध्वज अर्जुन ने धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण से यह वचन कहा।
[भावार्थ]
रणभूमि अब रक्तपात की प्रतीक्षा में है। तीर कमान पर चढ़ चुके हैं और विनाशकारी युद्ध की घड़ी आ चुकी है। इसी निर्णायक क्षण में अर्जुन, जिनके रथ की ध्वजा पर साक्षात् हनुमान जी (कपिध्वज) विराजमान हैं, अपना 'गाण्डीव' धनुष उठाते हैं। अर्जुन की दृष्टि सामने खड़ी कौरव सेना पर स्थिर है। वे अपने सारथी, इंद्रियों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से कुछ कहना चाहते हैं। यहीं से उस महासंवाद की नींव पड़ती है, जो अर्जुन के आत्म-मंथन की यात्रा को आरम्भ करेगा।
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श्रीमद्भगवद्गीता ऑडियोबुक: अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग)
साथियों, अब तक हमने सुना कि कैसे पाण्डवों के दिव्य शंखनाद ने आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए कौरवों के साहस को कम कर दिया। शस्त्र चलने ही वाले थे कि तभी अर्जुन ने अपना 'गाण्डीव' धनुष उठाया। आइए देखते हैं, उस क्षण अर्जुन के मन में क्या विचार आया और उन्होंने अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से क्या कहा।
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श्लोक 21:
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्॥
अर्जुन बोले—हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिये, ताकि मैं युद्ध की इच्छा से खड़े हुए इन विपक्षी योद्धाओं को देख सकूँ।
[भावार्थ]
अर्जुन यहाँ पूर्णतः आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। वे भगवान को 'अच्युत' कहकर संबोधित करते हैं, जिसका अर्थ है—वे जो कभी अपने पद या स्वरूप से विचलित नहीं होते। अर्जुन युद्ध की औपचारिक शुरुआत से पहले शत्रु सेना का निरीक्षण करना चाहते हैं। वे रणभूमि के केंद्र में खड़े होकर यह देखना चाहते हैं कि उनके विरुद्ध लड़ने की मंशा लेकर कौन-कौन एकत्र हुए हैं।
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श्लोक 22:
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥
कि इस युद्ध रूपी उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है, उन्हें मैं अच्छी तरह देख लूँ।
[भावार्थ]
यह एक योद्धा की रणनीतिक दृष्टि है। अर्जुन केवल शत्रुओं को देख नहीं रहे, बल्कि वे यह आकलन कर रहे हैं कि इस महासंग्राम में उन्हें किन महारथियों के शस्त्रों का सामना करना पड़ेगा। यहाँ अर्जुन के भीतर वीरता का संचार है और वे युद्ध के लिए पूरी तरह तत्पर दिखाई देते हैं।
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श्लोक 23:
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा से जो-जो ये राजा लोग यहाँ आए हैं, उन युद्ध करने वालों को मैं देखूँ।
[भावार्थ]
अर्जुन दुर्योधन को 'दुर्बुद्धि' कह रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह युद्ध दुर्योधन के लोभ का परिणाम है। वे उन राजाओं का निरीक्षण करना चाहते हैं जो सत्य को जानते हुए भी केवल दुर्योधन की प्रसन्नता के लिए अधर्म के पक्ष में खड़े हैं। यहाँ अर्जुन का स्वर न्याय और अधिकार की चेतना से भरा है।
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श्लोक 24:
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥
संजय बोले—हे धृतराष्ट्र! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन (गुडाकेश) द्वारा ऐसा कहे जाने पर, अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण (हृषीकेश) ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा कर दिया।
[भावार्थ]
यहाँ श्रीकृष्ण को 'हृषीकेश' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'इंद्रियों के स्वामी'। वे अर्जुन के मन की आगामी दुविधा को पहले से ही जानते हैं। अर्जुन को 'गुडाकेश' कहा गया है क्योंकि उन्होंने आलस्य और निद्रा को जीत लिया था। भगवान ने अर्जुन की आज्ञा का पालन करते हुए रथ को रणभूमि के मध्य में स्थित किया।
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श्लोक 25:
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥
भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा संपूर्ण राजाओं के सामने रथ खड़ा करके भगवान बोले—हे पार्थ! इन एकत्रित हुए कुरुवंशियों को देख।
[भावार्थ]
यहीं से भगवान की लीला आरंभ होती है। श्रीकृष्ण ने रथ को ठीक पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य के सामने खड़ा किया। भगवान ने यह नहीं कहा कि 'शत्रुओं को देख', उन्होंने कहा 'इन कुरून (कुरुवंशियों) को देख'। भगवान जानते थे कि अर्जुन के हृदय में छिपी ममता तभी बाहर आएगी जब वह अपने गुरुओं और पिताओं को सामने देखेगा।
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श्लोक 26:
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
उसके बाद अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचाओं, पितामहों, आचार्यों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों और पौत्रों को देखा।
[भावार्थ]
जैसे ही अर्जुन की दृष्टि सामने पड़ी, उनका योद्धा भाव लुप्त होने लगा। जहाँ वे पहले 'विपक्षी' देख रहे थे, अब उन्हें केवल अपना 'संसार' दिखने लगा। उन्हें वे आचार्य दिखे जिनसे शिक्षा ली थी और वे पितामह दिखे जिनकी गोद में वे खेले थे। रिश्तों का यह सागर उनके कर्तव्य के मार्ग में बाधा बनने लगा।
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श्लोक 27:
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोर्मपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥
साथ ही उन्होंने दोनों सेनाओं में ससुरों, मित्रों और सुहृदों को भी देखा। उन खड़े हुए संपूर्ण बंधु-बांधवों को देखकर वे कुन्तीपुत्र अर्जुन...
[भावार्थ]
अर्जुन की दृष्टि ने रणभूमि के हर कोने में अपने ही किसी संबंधी को पाया। उन्होंने देखा कि मृत्यु के जिस द्वार पर वे प्रहार करने जा रहे हैं, वहाँ उनके अपने ही प्रियजन खड़े हैं। यह दृश्य अर्जुन के मानसिक संतुलन को हिलाने के लिए पर्याप्त था।
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श्लोक 28:
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥
...अत्यंत करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले—हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से खड़े हुए इस स्वजन समुदाय को देखकर।
[भावार्थ]
यहाँ 'कृपया परयाविष्टो' शब्द का अर्थ है—अत्यंत गहरे मोह जनित करुणा से घिर जाना। अर्जुन जैसा वीर 'विषाद' (Deep Distress) में डूब गया। उनके शब्द अब वीरता के नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा और मोह के हैं। वे पूरी सेना को 'स्वजन' (अपने लोग) के रूप में देख रहे हैं।
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श्लोक 29:
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥
मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है। मेरे शरीर में कंपन और रोमांच (रोंगटे खड़े होना) हो रहा है।
[भावार्थ]
विषाद का प्रभाव अर्जुन के शरीर पर दिखने लगा है। मोह के कारण उनके स्नायु तंत्र पर इतना दबाव है कि उनके शरीर के अंगों ने साथ देना छोड़ दिया है। जिसे कभी मृत्यु का भय नहीं था, आज अपनों के प्रति आसक्ति ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया है।
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श्लोक 30:
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा में बहुत जलन हो रही है। मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है, मैं खड़ा रहने में भी समर्थ नहीं हूँ।
[भावार्थ]
अर्जुन का विश्व-प्रसिद्ध धनुष 'गाण्डीव' उनके हाथों से फिसल रहा है। यह केवल एक धनुष का गिरना नहीं, बल्कि एक योद्धा के संकल्प का बिखरना है। उनका मन इतना व्याकुल है कि उन्हें दिशाओं का ज्ञान नहीं रहा और वे रथ पर खड़े रहने की शक्ति भी खो चुके हैं। यहाँ अर्जुन पूरी तरह मानसिक रूप से पराजित हो चुके हैं।
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श्रीमद्भगवद्गीता ऑडियोबुक: अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग)
अब तक हमने देखा कि रणभूमि के मध्य पहुँचते ही अर्जुन का धैर्य जवाब दे गया। अपने ही गुरुओं और संबंधियों को सामने देखकर उनका 'गाण्डीव' हाथ से छूट गया और वे गहरे शोक में डूब गए। अब अर्जुन अपनी इस मानसिक निर्बलता को उचित सिद्ध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख कई दार्शनिक और व्यावहारिक तर्क रखेंगे।
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श्लोक 31:
निमित्तानी च पश्यामि विपरीतानी केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥
हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारकर कुछ कल्याण भी नहीं देखता।
[भावार्थ]
अर्जुन की बुद्धि अब पूरी तरह मोह से ढकी जा चुकी है। जब मनुष्य कर्तव्य से भागना चाहता है, तो उसे सब कुछ अशुभ और अमंगलकारी दिखने लगता है। वे कह रहे हैं कि यदि इस विजय की कीमत अपने ही परिवार का रक्त है, तो ऐसी जीत में कोई 'श्रेय' या भलाई नहीं है। वे युद्ध को धर्म की दृष्टि से नहीं, बल्कि केवल 'अपनों और परायों' की दृष्टि से देख रहे हैं।
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श्लोक 32:
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य और न सुखों को ही। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या लाभ, और ऐसे भोगों तथा जीवन से भी क्या प्रयोजन?
[भावार्थ]
अर्जुन यहाँ एक वैरागी की भाँति बातें कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि राज्य और सुख का आनंद तो अपनों के साथ लिया जाता है। यदि वे 'अपने' ही नहीं रहेंगे, तो अकेले उस वैभव को भोगने का क्या अर्थ? अर्जुन कृष्ण को 'गोविन्द' कहकर पुकार रहे हैं, जो इंद्रियों को प्रकाश देने वाले हैं, मानो वे अपनी इंद्रियों की व्याकुलता को शांत करने की प्रार्थना कर रहे हों।
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श्लोक 33:
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥
जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुखादि की इच्छा करते हैं, वे ही ये सब आचार्य, पिता, पुत्र और पितामह आदि प्राणों की और धन की आशा छोड़कर युद्ध में खड़े हैं।
[भावार्थ]
अर्जुन की दृष्टि सामने खड़ी सेना के उन चेहरों पर टिकी है जिनसे उन्होंने कभी प्रेम और सम्मान पाया था। उन्हें दुःख है कि वे ही लोग आज मृत्यु का वरण करने के लिए यहाँ उपस्थित हैं। मोह के कारण अर्जुन यह भूल गए हैं कि ये लोग सत्य का गला घोंटने वाले अधर्म के पक्ष में खड़े हैं।
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श्लोक 34:
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलः श्वसुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥
आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य सभी संबंधी यहाँ उपस्थित हैं।
[भावार्थ]
अर्जुन रिश्तों की लंबी सूची गिना रहे हैं। यह श्लोक उस मानसिक बोझ को दर्शाता है जो संबंधों के मोह के कारण अर्जुन महसूस कर रहे हैं। उनके लिए सामने खड़े लोग अब 'योद्धा' नहीं, बल्कि 'रिश्ते' बन चुके हैं।
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श्लोक 35:
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥
हे मधुसूदन! यदि ये मुझे मार भी डालें, तो भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता; फिर इस पृथ्वी के राज्य के लिए तो कहना ही क्या? मैं तो तीनों लोकों के राज्य के लिए भी इन्हें मारना नहीं चाहता।
[भावार्थ]
अर्जुन की पीड़ा यहाँ अपनी चरम सीमा पर है। वे कह रहे हैं कि भले ही कौरव उन पर प्रहार करें, पर वे शस्त्र नहीं उठाएंगे। वे कृष्ण को 'मधुसूदन' (मधु दैत्य का वध करने वाले) कहकर पुकार रहे हैं, मानो पूछ रहे हों कि दैत्यों को मारना तो उचित था, पर अपने कुल को मारना कैसे उचित हो सकता है?
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श्लोक 36:
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा।
[भावार्थ]
शास्त्रों के अनुसार जो अग्नि लगाता है, विष देता है या शस्त्र उठाकर हत्या के लिए आता है, वह 'आततायी' है और उसे मारना पाप नहीं है। अर्जुन जानते हैं कि कौरव आततायी हैं, फिर भी वे कह रहे हैं कि उन्हें मारने से 'पाप' लगेगा। यहाँ अर्जुन धर्म की व्याख्या अपने मोह के अनुसार कर रहे हैं।
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श्लोक 37:
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
अतः अपने ही संबंधी धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं है। हे माधव! अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?
[भावार्थ]
अर्जुन का तर्क अब पारिवारिक मर्यादाओं पर केंद्रित है। वे कह रहे हैं कि परिवार को नष्ट करके कभी सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे कृष्ण को 'माधव' (मौन या विद्या के स्वामी) कहकर अपनी दुविधा का समाधान खोज रहे हैं।
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श्लोक 38:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥
यद्यपि लोभ से भ्रष्ट हुए चित्त वाले ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष और मित्रों के साथ द्रोह करने के पाप को नहीं देख रहे हैं।
[भावार्थ]
अर्जुन दुर्योधन और उसके पक्ष की आलोचना कर रहे हैं कि वे तो लोभ में अंधे हैं, पर अर्जुन स्वयं को विवेकी मान रहे हैं। अक्सर मोह में मनुष्य को लगता है कि केवल वही सही सोच रहा है और बाकी सब गलत हैं।
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श्लोक 39:
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥
परंतु हे जनार्दन! कुल के नाश से होने वाले दोष को स्पष्ट देखने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
[भावार्थ]
अर्जुन कृष्ण को समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि 'हम' तो समझदार हैं, हमें तो इस विनाश को रोकना चाहिए। वे युद्ध को केवल 'कुल-नाश' के पाप के रूप में देख रहे हैं, 'धर्म-स्थापना' के पुण्य के रूप में नहीं।
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श्लोक 40:
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥
कुल के नाश होने पर सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म के नष्ट हो जाने पर संपूर्ण कुल में अधर्म फैल जाता है।
[भावार्थ]
अर्जुन यहाँ एक गंभीर सामाजिक चिंता प्रकट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब परिवार के संरक्षक और बड़े-बुजुर्ग युद्ध में मारे जाते हैं, तो संस्कारों की परंपरा टूट जाती है। बिना मार्गदर्शक के परिवार और समाज में अधर्म का प्रसार होने लगता है।
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श्लोक 41:
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥
हे कृष्ण! अधर्म के बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्ण-संकर (अवांछित संतान) पैदा होती है।
[भावार्थ]
अर्जुन का तर्क सामाजिक मर्यादाओं के टूटने की ओर इशारा करता है। वे डरे हुए हैं कि युद्ध के बाद अराजकता फैलेगी जिससे कुल की पवित्रता और संस्कार नष्ट हो जाएंगे।
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श्लोक 42:
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
वह वर्ण-संकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने वाला होता है। इनके पितर भी श्राद्ध और तर्पण की क्रिया से वंचित होकर गिर जाते हैं।
[भावार्थ]
अर्जुन प्राचीन परंपराओं और पितृ-ऋण का हवाला दे रहे हैं। उनका मानना है कि जब कुल नष्ट होगा, तो पितरों को जल देने वाला भी कोई नहीं बचेगा। अर्जुन की बुद्धि पूरी तरह रूढ़ियों और मोह में उलझ चुकी है।
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श्लोक 43:
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
इन वर्ण-संकर पैदा करने वाले दोषों से कुलघातियों के सनातन जाति-धर्म और कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं।
[भावार्थ]
अर्जुन कह रहे हैं कि युद्ध केवल लोगों को नहीं मारता, बल्कि वह एक पूरी संस्कृति, जाति और कुल की मर्यादाओं का अंत कर देता है। वे युद्ध के प्रति अत्यंत घृणा से भर चुके हैं।
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श्लोक 44:
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥
हे जनार्दन! जिनके कुल-धर्म नष्ट हो गए हैं, ऐसे मनुष्यों का बहुत समय तक नरक में निवास होता है—ऐसा हम सुनते आए हैं।
[भावार्थ]
अर्जुन अपने तर्कों को पुख्ता करने के लिए शास्त्रों की सुनी-सुनाई बातों का उल्लेख कर रहे हैं। वे डरे हुए हैं कि युद्ध करके वे और उनके भाई नरक के भागी बनेंगे।
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श्लोक 45:
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥
अहो! शोक है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हैं।
[भावार्थ]
यहाँ अर्जुन स्वयं को धिक्कार रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि वे केवल एक भूमि के टुकड़े और राज्य के सुख के लिए अपनों का वध करने जा रहे हैं। उनका पश्चाताप उनकी मानसिक निर्बलता को और बढ़ा रहा है।
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श्लोक 46:
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥
यदि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र मुझे रणभूमि में सामना न करने वाले और शस्त्रहीन को मार भी दें, तो वह मरना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
[भावार्थ]
अर्जुन अब पूर्ण आत्मसमर्पण की स्थिति में हैं। वे लड़ने के बजाय मरना बेहतर समझ रहे हैं। वे कह रहे हैं कि वे निहत्थे खड़े रहेंगे, भले ही कौरव उन्हें मार दें। यह एक महान योद्धा का अपने कर्तव्य से पूर्ण पलायन है।
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श्लोक 47:
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
संजय बोले—रणभूमि में ऐसा कहकर, शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।
[भावार्थ]
यह इस अध्याय का अंतिम और सबसे मार्मिक दृश्य है। जिस अर्जुन के शंखनाद ने शत्रुओं को कँपा दिया था, आज वही अर्जुन रोते हुए अपने रथ के पिछले हिस्से में गिर पड़े हैं। उनका गाण्डीव नीचे पड़ा है और वे पूर्णतः हताश हैं। यहीं 'अर्जुनविषादयोग' पूर्ण होता है—जहाँ एक जीव अपनी शक्ति हारकर ईश्वर के सम्मुख अपना दुःख उड़ेल देता है।
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[समापन]
साथियों, यहाँ पूर्ण होता है श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय। अर्जुन का यह विषाद, यह दुख ही वह भूमि तैयार करेगा जिस पर भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य ज्ञान का बीज बोएंगे। जब तक मनुष्य अपनी शक्ति पर अहंकार करता है, उसे ईश्वर की आवश्यकता नहीं होती; लेकिन जब वह अर्जुन की तरह टूटकर 'विषाद' में गिरता है, तभी उसके जीवन में 'गीता' का प्रवेश होता है।
अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन की इस कायरता को दूर करने के लिए 'सांख्ययोग' का उपदेश देंगे। **Sanatana Hindu Channel** से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद।
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जय श्री कृष्णा!
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